Hindi Kahaniya With Moral | सत्यवादी महाराज हरिश्चंद्र की कहानी

Hindi Kahaniya With Moral Harishchandra ki kahaniछोटे-बड़े सबको Hindi Kahaniya पढ़ना या सुनना बहुत ही प्रिये लगता हैं। महाराजा हरिश्चंद्र की कहानी Moral से भरपूर कहानी हैं। महाराजा हरिश्चंद्र अपने सत्यवादी व्यवहार  जग में प्रसिद्ध हैं। महान लोगो के जीवन की कहानिया हमें जीवन में सही राह दिखता हैं। कहानिया समाज का निर्माण करती हैं। Hindi Kahaniya With Moral  हमेशा से रहा हैं। कहानियाँ हमारे जीवन में एक विशेष स्थान रखती हैं।



Hindi Kahaniya  Moral stories  कभी हमें हँसाती हैं तो कभी रुला भी देती हैं लेकिन महत्वपूर्ण बात यह हैं की खेलते-कूदते भी कहानियाँ हमें बहुत सिख दे जाती हैं। भारत में नाना-नानी या दादा-दादी द्वारा कहानियाँ सूना के ही बालक के कोमल ह्रदय में संस्कार और संस्कृति और ज्ञान का वास कराया जाता रहा हैं। मुझे बहुत अच्छी तरह से याद हैं मेरे दादा जी बचपन में ही मुझे सारा रामायण और महाभारत की कहानिया सूना दी जिससे मुझे बहुत कुछ सिखने को मिला और आज जो मेरा यह जीवन हैं कही ना कही उन्ही कहानियों का परिणाम हैं।


तो चलिए प्रेरक कहानियों के सिलसिला में आज हम एक महान सूर्यवंशी राजा हरिश्चंद्र के जीवन से जुडी कहानी को पढ़ेंगे और उससे सिख लेंगे की कैसे राजा ने सत्य का आचरण और ईमानदारी ही सर्वोत्तम  निति हैं इसका पाठ पढ़ाया। तो चलिए शुरू करते हैं सत्य की महिमा 

Hindi Kahaniya With Moral | सत्यवादी महाराजा हरिश्चंद्र
Hindi Kahaniya With Moral | सत्यवादी महाराजा हरिश्चंद्र


 Hindi Kahaniya With Moral

प्राचीन समय की बात हैं सूर्यवंश में अनेक प्रतापी, धर्मी, न्याय प्रिये तथा शूरवीर राजा हुवे हैं। महाराजा हरिश्चंद्र भी इसी वंश के एक सत्यप्रिये, ईमानदार और प्रतापी राजा थे। राजा बहुत ही धार्मिक, गुणी और सत्यवादी थे। वह अपने वचन पर सदा ढृढ़ रहते थे। उनके इस सद्गुण की प्रसिद्धि तीनो लोको में होने लगी। हर जगह महाराज के सत्यवादी गुणों का ही बखान होने लगा। क्या वृद्ध क्या बच्चा सबके जुबान पर हरिश्चंद्र की बड़ाई ही थी। 


इंद्रलोक में हरिश्चंद्र गुणगान की चर्चा सुन कर भगवान् इन्द्र ने हरिश्चंद्र की परीक्षा लेने का निश्चय किया। हरिश्चंद्र के सत्य की परीक्षा लेने के लिए इंद्र ने महर्षि विश्वामित्र को भेजा। और कहा की हे महर्षि मैं चारो तरफ हरिश्चंद्र का गुणगान ही सुन रहा हूँ  बड़ा सत्यवादी हैं इसीलिए मैं चाहता आप जाइये और महाराज की परीक्षा लीजिये की आखिर हरिश्चंद्र के सत्यवादी होने की सीमा क्या हैं ? कही यह सब उसका आडम्बर तो नहीं ? महर्षि ने हाथ जोड़ कर कहा जो आज्ञा प्रभु और हरिश्चंद्र की परीक्षा लेने के लिए निकल पड़े। 

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एक हजार स्वर्ण मुद्राएँ - Hindi Kahaniya

महर्षि विश्वामित्र महाराज हरिश्चंद्र के पास पहुँचे। हरिश्चंद्र ने महर्षि का बहुत ही आदर-सत्कार किया तथा उचित स्थान देकर, स्थान ग्रहण करने का निवेदन किया और हाथ जोड़ कर बोले- महर्षि ! आज्ञा दीजिये। मैं क्या सेवा करूँ ? महर्षि विश्वामित्र बोले 'राजन ! हम तुम्हारा सम्पूर्ण राज्य चाहते हैं। बोलो क्या इक्षा हैं ?'  



महाराज हरिश्चंद्र सत्यवादी होने के साथ-साथ ज्ञानी भी थे। वे जानते थे महर्षि तो साक्षात् भगवान् का रूप हैं।  सारी दुनिया ही उनकी हैं फिर वो मेरे छोटे राज्य में कभी भी आसक्ति नहीं दिखा सकते जरूर कोई कल्याण का कार्य हेतु महर्षि ऐसी माँग कर रहे हैं। महाराज बोले -'महर्षि! जो आज्ञा। आजसे अभीसे यह राज्य आपका हो गया। सम्भालिये।' यह कहकर हरिश्चंद्र ने अपना सम्पूर्ण राज्य महर्षि को देने का वचन दिया। 


महर्षि विश्वामित्र बोले- 'राजन! जप, तप, दान बिना दक्षिणा के सफल नहीं होते हैं। तुमने मुझे अपना राज्य अवश्य दिया हैं, परन्तु दक्षिणा नहीं दी हैं। हरिश्चंद्र ने हाथ जोड़ते हुवे कहा 'जी! आप आदेश करे मैं दक्षिणा भी दूंगा आपको दक्षिणा में क्या चाहिए ?' महर्षि ने कहा- 'मुझे दक्षिणा में एक हजार स्वर्ण मुद्रा और चाहिए।'


महाराज हरिश्चंद्र बोले - 'महर्षि! एक हजार स्वर्ण मुद्रा इस समय तो मेरे पास नहीं हैं। मुझे कुछ दिन की छूट देने की कृपा करे ताकि मैं एक हजार स्वर्ण मुद्राओ को धर्म से जमा कर सकू और आपका दक्षिणा दे सकू। ' महर्षि विश्वामित्र बोले - 'अच्छा! मैं तुम्हे एक महीने की छूट देता हूँ। इस बिच में तुम मुझे एक हजार स्वर्ण मुद्राएँ दे देना।'


Hindi Kahaniya With Moral | सत्यवादी महाराजा हरिश्चंद्र
Hindi Kahaniya With Moral | सत्यवादी महाराजा हरिश्चंद्र


Hindi Kahaniya With Moral- पुत्र की मृत्यु 

राजा हरिश्चंद्र महर्षि को वचन देकर महारानी शैब्या और पुत्र रोहिताश्च को लेकर काशी चले आये। काशी में आकर उन्होंने महारानी शैब्या को एक ब्राह्मण के यहाँ बेच दिया। बालक रोहितश्च बहुत छोटा था, अतः वह भी अपनी माँ के साथ ब्राह्मण के यहाँ रह गया।  महाराज हरिश्चंद्र ने स्वयं अपने आपको एक चांडाल के हाथो बेच दिया।



इस प्रकार महाराज ने अपनी पत्नी तथा स्वयं को बेचकर एक हजार स्वर्ण मुद्राएँ इकठ्ठी करके महर्षि विश्वामित्र को दक्षिणा में दी। महारानी शैब्या ब्राह्मण के घर में दासी का काम करने लगी। महाराज चांडाल के सेवक होकर शमशान-घाट पर मुर्दे जलाने का काम करने लगे। 


एक दिन महाराज का पुत्र रोहिताश्च पूजा के लिए फूल तोड़ चुन रहा था की उसे एक जहरीले सर्प ने काट लिया। रोहिताश्च मूर्छित होकर गिर पड़ा और कुछ क्षण बाद मर गया। महारानी रोती-बिलखती पुत्र का शव लेकर शमशान में पहुँची। रात का समय था। उस घोर अंधकार में उन्हें धीरज देनेवाला कोई नहीं था। वे पुत्र जलाने जा ही रही थी की शमशान के रखवाले हरिश्चंद्र आ गए और शमशान का कर माँगने लगे। 


महारानी शैब्या के पास कफ़न तक के लिए कपडा नहीं था, वो कर कहाँ से देती। रात की अंधियारी में महाराज पत्नी को न पहचान सके, परन्तु महारानी महाराज को पहचान गयीं और बोली - 'हे नाथ! यह आपका ही बालक रोहिताश्च ही हैं सर्प दंश के कारण इसकी मृत्यु हो गई हैं। इसका कर कहाँ से दूँ।' और पुत्र वियोग में फफक-फफक कर रोने लगी।  

राजकुमार रोहितश्च मरा नहीं हैं-

रोहिताश्च का नाम सुनते ही महाराज सिहर उठे, किन्तु वे अपने कर्तव्य पर अटल रहे।  बोले - 'महारानी! मैं चाण्डाल का सेवक हूँ। मेरा धर्म चाण्डाल की आज्ञा मानना हैं। मैं बिना कर लिए कुमार को नहीं जलने दे सकता हूँ।'



रानी फिर फुट-फुटकर रोने लगी। बोलीं - 'नाथ! मेरे पास यही एक वस्त्र हैं, जिसे मैं पहिने हुए हूँ। आप इसीमे से एक टुकड़ा ले लीजिये।' इतना कह कर रानी वस्त्र फाड़ने लगी। इतने में आकाश से फूँलों की वर्षा होने लगी। भगवान्, धर्मराज और महर्षि विश्वामित्र तीनो वहाँ प्रकट हो गए। महर्षि ने कहा - 'राजन  धन्य हैं। आप सत्य के लिए धन्य हैं। राजकुमार रोहितश्च मरा नहीं हैं। वह योगमाया से मूर्छित हो गया हैं।' 

सत्यवादी महाराजा हरिश्चंद्र
सत्यवादी महाराजा हरिश्चंद्र


विश्वामित्र ने मन्त्र पढ़कर रोहितश्च पर जल छिड़का। कुमार रोहिताश्च मूर्छा से जाग गए। अपने पुत्र को पुनः जीवित देखकर रानी ने झट से अपने लाल को गले लगा लिया और उसके आँखों से ख़ुशी के आँशु निकल पड़े। महर्षि का चमत्कार और अपने पुत्र को जीवित देखकर महाराज भी प्रसन्न हो गए और भगवान् की स्तुति करने लगे। 


हरिश्चंद्र  पर इंद्र भगवान् बहुत प्रसन्न हुवे तथा तीनो लोक में हरिश्चंद्र को प्रसिद्धि का आशीर्वाद दिया। महाराज हरिश्चंद्र ने हाथ जोड़ कर महर्षि को प्रणाम किया। महर्षि प्रसन्न होकर महाराज हरिश्चंद्र को अयोध्या का राज्य लौटा दिया। महाराज हरिश्चंद्र फिर अयोध्या के राजा बन महारानी शैब्या और कुमार रोहिताश्च के साथ ख़ुशी-ख़ुशी राज्य करने लगे और पूरी ईमानदारी पूर्वक जनता की सेवा करने लगे।     


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