श्रीमद भगवत गीता प्रथम 10 श्लोक हिंदी अर्थ सहित।

गीता के प्रथम 10 श्लोक हिंदी व्याख्या सहित : 

गीता ज्ञान के ज्ञान के रहस्यों को जान लेने के बाद कुछ भी जानना शेष नहीं रह जाता हैं। पुरे विश्व में गीता को किसी भी प्रमाण की आवश्यकता नहीं हैं गीता वह कामधेनु और कल्पवृक्ष हैं जिसको प्रमाण मान कर ऋषियों ने विद्वानों ने अपनी रचनाएँ की हैं।  विद्या का लक्ष्य गीता के परम रहस्यों को ही जानना हैं। गीता खुद  प्रमाण हैं, गीता को किसी भी प्रकार के प्रमाण की आवश्यकता नहीं हैं। बड़े बड़े आचार्यो ने विद्वानों ने अपने-अपने सिद्धांतो की प्रमाणिकता सिद्ध करने के लिए श्री गीता को ही मख्य आधार माना हैं। गीता पर भाष्य रच, टिका लिख अपने सिद्धांतो को गीता-सम्मत बताना ही आचार्यो का हमेशा से लक्ष्य रहा हैं।

गीता-विरोधी किसी भी संप्रदाय को विद्वान जान असंभव समझते हैं।  विद्वान जानो का तो मानना है जो भी धर्म गीता से सर्व सम्मत नहीं हैं फिर वो धर्म नहीं अधर्म की श्रेणी में आता हैं। जिस धर्म, आचार व सिद्धांत को ब्रह्मरूपा गीता से सिद्ध कर दिया वो सर्वशास्त्र और वेद-सम्मत मान लिया जाता हैं।

द्वापरयुग(आज से लगभग साढ़े पाँच हजार वर्ष पहले ) में हस्तिनापुर के भाइयो की लड़ाई पुरे भारतवर्ष में भीषड़ युद्ध का रूप में बदल जाती हैं परमाणु बम जैसे विध्वंशक अस्त्र ब्रह्मास्त्र का साक्षी रहा लाखो से ज्यादा लोगो की हत्या हुई इस पुरे इतिहास को महर्षि व्यास में महाभारत नामक विश्व के सबसे बड़ी रचना में लिखा हैं। महाभारत युद्ध में इतना लहू बहा था की करुक्षेत्र की रणभूमि आज भी लाल हैं। यह युद्ध सिर्फ हस्तिनापुर के  सिंघासन पर सिर्फ अधिकार या वर्चस्व के लिए ही नहीं लड़ा गया था यह युद्ध धर्मयुद्ध भी था यह युद्ध धर्म के विजय के लिए भी लड़ी गई थी कौरव पुत्रो और पांडवपुत्रो के बिच लड़े गए इस युद्ध में पाण्डवपुत्र धर्म को आधार मान कर युद्ध में विजय के लिए खड़े हुवे थे वही कौरव पुत्र सिर्फ हस्तिनापुर के युवराज बनाने के लालच में सिंघासन पर अपने एकाधिकार के लिए वह अधर्म का मार्ग अपनाया और अधर्म के साथ युद्ध भूमि में खड़े थे।

युद्ध के समय युद्धभूमि में कौरव और पांडवो की सेना आमने सामने युद्ध करने के लिए तैयार कड़ी थी।  पांडव पुत्र धनुर्धारी अर्जुन ने भगवान् श्री कृष्ण को रथ को दोनों सेनाओ के मध्य में ले जाने का आग्रह किया। भगवान् श्री कृष्ण ने रथ को दोनों सेनाओ के मध्य में गए फिर अर्जुन ने सामने खड़े अपने प्रियजन को देख कर मोहग्रस्त हो गए और भगवान् श्री कृष्ण से नाना प्रकार के प्रमाण देते हुवे कहने लगे अपने दादा, गुरु और भाइयो को मार कर इस युद्ध को जित कर यदि मुझे पुरे पृथ्वी का भी राज मिल जाये तो भी मैं सुखी नहीं रह सकता यह युद्ध शास्त्र सम्मत नहीं, इस युद्ध से कुल ख़त्म होने का खतरा हैं और कुल ख़त्म करने का भी पाप लगता हैं इसीलिए युद्ध अनुचित हैं और उसे यह युद्ध नहीं करनी चाहिए। युद्धभूमि में खड़े होकर एक क्षत्रिय अर्जुन द्वारा ऐसी माया से वशीभूत बात सुन कर श्री कृष्ण ने जो ज्ञान दिया वही ज्ञान गीता कहलाया जिसमे कुल अठारह अध्याय और 700 श्लोक हैं आइये आज प्रथम 10  श्लोकों को पुरे विस्तार पूर्वक अर्थ सहित जानते हैं।

 जन्म से अंधे धृतराष्ट्र का मन कौतुहल से भरा था। धृतराष्ट्र केअपने ज्येष्ठ पुत्र दुर्योद्धन को राज गद्दी पर बैठाने की कामना भी कही न कही इस युद्ध के मुख्य कारणों में से एक हैं।

कौरव के पिता धृतराष्ट्र संजय से पूछते है बताओ युद्ध भूमि धर्मभूमि करुक्षेत्र में क्या हो रहा हैं ?

गीता इन हिंदी
Geeta in hindi 

                                     धृतराष्ट्र उवाच 

                        धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे समवेता युयुत्सवः  । 
                    मामकाः पाण्डवाश्चैव किमकुर्वत संजय  ।। 
भावार्थ: "धृतराष्ट्र, संजय से पूछते हैं की धर्मक्षेत्र में करुक्षेत्र में युद्ध की इक्षा से एकत्रित मेरे और पांडव के पुत्र क्या कर रहे हैं ?"

                                  संजय उवाच 
महर्षि वेद व्यास जी ने धृतराष्ट्र की युद्ध को जानने की इक्षा को पूर्ण करने के लिए संजय को दिव्यदृष्टि दी थी जिससे की संजय बिना युद्ध भूमि में गए ही युद्ध का सारा आंखोदेखा हाल जिसे आज हम लाइव कमेंट्री कहते हैं सुनाया।  :-

                दृष्टवा तु पाण्डवानीकं व्यूढं दुर्योधनस्तदा  
                आचार्यमुपसंगम्य राजा वचनमब्रवीत  ।
भावार्थ: संजय कहते हैं की- उस समय राजा दुर्योधन ने पांडवो की विशाल सेना के व्यूहरचना को देख कर आचार्य गुरुद्रोण के समिप जा कर यह वचन कहा। 

                  
              पश्यैतां पाण्डुपुत्राणामाचार्य महतीं चमूम्                        
                व्यूढां द्रुपदपुत्रेण तव शिष्येण धीमता।
भावार्थ: हे आचार्य ! पाण्डुपुत्रों के इस विशाल सेना को देखिए जो आपके ही बुद्धिमान शिष्य द्रुपदपुत्र धृष्टधुम्न द्वारा व्यूहाकार खड़ी की गई हैं। 


             अत्र शूरा महेष्वासा भीमार्जुनसमा युधि। 
             युयुधानो विराटश्च द्रुपदश्च महारथः 
            धृष्टकेतुश्चेकितानः काशिराजश्च वीर्यवान। 
            पुरुजित्कुन्तिभोजश्च शैब्यश्च नरपुङग्वः  ।।
            युधामन्युश्च विक्रान्त उत्तमौजाश्च वीर्यवान। 
            सौभद्रो द्रौपदेयाश्चा सर्व एवं महरथाः ।।
भावार्थ: इस सेना में बड़े बड़े धनुषवाले योद्धा तथा युद्ध में अर्जुन और भीम सामान शूरवीर योद्धा, विराट और राजा द्रुपद जैसे महारथी, धृष्टकेतु, चेकितान तथा वीर्यवान काशी नरेश, पुरुजित, कुन्तिभोज और मनुष्यो में श्रेष्ठ शैब्य, पराक्रमी युधा मन्यु  तथा बलवान उत्तमौजा, सुभद्रा पुत्र एवं द्रौपदी पाँचो पुत्र : ये सभी महारथी हैं।   
               

            अस्माकंतु विशिष्टा ये तान्निवोध द्विजोत्तम 
            नायका मम सैन्यस्य संज्ञार्थ तान ब्रवीमिते ।।
भावार्थ: हे ब्राह्मणश्रेष्ठ ! अपने पक्ष में भी जो प्रधान हैं उनको आप समझ लीजिए। आपकी जानकारी के लिए मेरे सेना के जो जो सेनापती हैं उनके बारे में बतलाता हूँ ।। 


            भवान्भीष्मश्च कर्णश्चकृपश्च समितिञ्जयः 
             अश्वत्थामा विकर्णश्च सौमदत्तिस्तथैव च  ।। 
भावार्थ: आप - द्रोणाचार्य पितामह भीष्म तथा कर्ण और संग्रामविजयी कृपाचार्य तथा वैसे ही अश्वत्थामा, विकर्ण और सोमदत्त का पुत्र भूरिश्रवा  ।। 


       अन्ये च बहवः शूरा मदर्थे त्यक्तजीविताः  ।
        नानाशस्त्रप्रहरणाः सर्वे युद्धविशारदाः  ।।
भावार्थ: और भी मेरे लिए जीवन की आशा त्याग देने वाले बहुत-से शूरवीर अनेक प्रकार के शस्त्र अस्त्रों सुसज्जित और सब के सब चतुर हैं। 


          अपर्याप्तं तदस्माकं बलं भीष्माभिरक्षित्तम् 
          पर्याप्तं त्विदमेतेषां बलं भीमाभिरक्षितम्  ।।
भावार्थ: भीष्मपितामह द्वारा रक्षित हमारी वह सेना सर्व प्रकार से अजेय हैं भीम द्वारा रक्षित इनलोगो की यह सेना जितने में सुगम हैं।     
                                                     

                              
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