Munshi Premchand Biography In Hindi: मुंशी प्रेमचंद का जीवन परिचय अत्यंत साधारण यद्यपि विशिष्ट था। इनके द्वारा लिखित कहानियाँ दुनिया में एक अलग पहचान बनाने में सफल हुई। 'उपन्यास सम्राट' कहे जाने वाले मुंशी प्रेमचंद का मूल नाम धनपत राय श्रीवास्तव था, जिन्हे नवाब राय या मुंशी प्रेमचंद के नाम से भी जाना जाता हैं। बंगाल के प्रख्यात उपन्यासकार शरतचंद चटोपाध्याय ने सर्वप्रथम मुंशी प्रेमचंद को उपन्यास सम्राट नाम से सम्बोधित किया था। मुंशी प्रेमचंद को हिन्दू और उर्दू दोनों भाषाओ में महारथ हासिल थी तथा वे दोनों भाषाओ के लेखक थे। मुंशी प्रेमचंद लेखक होने के साथ साथ एक सचेत नागरिक, विद्वान, कुशल वक्ता तथा विद्वान् संपादक थे।
munshi premchand
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मुंशी प्रेमचंद ने साहित्य को एक नए आयाम तक पहुँचाया उन्होंने सबसे पहले साहित्य के यथार्थवादी परंपरा (सामाजिक सरोकारो और प्रगतिशील मूल्यों पर केंद्रित लेखन परंपरा) की नीव रखी। यशपाल से लेकर मुक्तिबोध जैसे विद्वान लेखकों ने भी मुंशी प्रेमचंद की राह पर चलने का कार्य किया तथा यथार्थवादी परंपरा का अनुसरण किया और उसे आगे भी बढ़ाया। मुंशी प्रेम चाँद की अधिकतर रचनाएँ आम आदमी पर केंद्रित हैं जिस वजह से उनके रचनाओं में आम जीवन की समस्या को उजागर किया गया हैं।

गुलामी काल में मुंशी प्रेमचंद ने सोजे वतन (राष्ट्र का विलाप) नामक रचना करके लोगो के अंदर राष्ट्रवाद की भावना को जगाने का प्रयास किया जिसे बाद में कलक्टर द्वारा तलब किया गया और मुंशी प्रेमचंद पर अपनी रचनाओं द्वारा लोगो को भड़काने का आरोप लगा और उनकी रचना सोजो वतन  की सभी प्रतियाँ जब्त करके नष्ट कर दी गई तथा उनको वार्निग दी गई दुबारा ऐसा रचना किया तो जेल में डाल दिए जाओगे।

उस समय तक प्रेमचंद नवाब राय के नाम से लिखते थे फिर इस घटना के बाद अपने एक अजीज मित्र और जमाना पत्रिका के प्रमुख संपादक के सलाह पर नाम बदल कर लिखने का कार्य करने लगे। उसके बाद से ही 'प्रेमचंद' के नाम से उन्होंने लेखन कार्य आरम्भ किया और कई कालजयी रचना कर डाली। 


मुंशी प्रेमचंद का जीवन परिचय :

मुंशी प्रेमचंद का जन्म 31 जुलाई 1880 के दिन लमही नामक जगह पर हुआ था। लमही, उत्तर प्रदेश राज्य के बनारस शहर नजदीक ही लगभग चार मिल दूर स्थित हैं। मुंशी प्रेमचंद के पिताजी डाकमुंशी का कार्य करते थे इसीलिए लोग उन्हें मुंशी जी कहकर पुकारते थे।

प्रेमचंद के पिताजी का नाम मुंशी अजायबराय श्रीवास्तव तथा माताजी का नाम आनन्दी देवी था। प्रेमचंद जब मात्र सात वर्ष के थे तो उनकी मातजी तथा 14 साल की अल्पायु में पिताजी के मृत्यु के कारन मुंशी प्रेमचंद का बचपन बहुत ही कठिनाई से संघर्ष करते हुवे बिता हैं।  

मुंशी प्रेमचंद के प्रारंभिक शिक्षा का माध्यम उर्दू और फ़ारसी था। मुंशी जी को बचपन से ही पढ़ने का बहुत शौक था उन्होंने बचपन में ही उर्दू कहानियाँ पढ़ ली थी। 1818 में मैट्रिक की परीक्षा पास करते ही मुंशी जी की नौकरी स्थानीय स्कूल में अध्यापक के कार्य में लग गई। मुंशी जी का जीवनयापन अध्यापन से  चलता था।

मुंशी जी स्कूल में बच्चो को शिक्षा देने के साथ साथ अपनी पढाई भी चालू रखी। 1910 में दर्शन, अंग्रेजी, फ़ारसी तथा इतिहास विषय के साथ इंटर की परीक्षा पास की। बीए पास  बाद मुंशी जी ने शिक्षा विभाग में इंस्पेक्टर के पद पर भी अपनी सेवाएं दी हैं।

मुंशी प्रेमचंद ने अपने लेखन कार का आरम्भ जमाना पत्रिका से की।  मुंशी प्रेमचंद जमाना पत्रिका में धनपत राय नाम से लिखा करते थे बाद में जमाना पत्रिका के संपादक और मुंशी जी के परम मित्र मुंशी दयानारायण निगम के सलाह पर प्रेमचंद के नाम से लिखना शुरू किया जो बाद में उनकी पहचान बना। पूरी दुनिया मुंशी प्रेमचंद के नाम से जानती हैं।

मुंशी प्रेमचंद आर्य समाज से प्रभावित थे तथा विधवा विवाह के पक्षधर थे : 

मुंशी प्रेमचंद दयानद सरस्वती द्वारा संगठित आर्समाज से बहुत प्रभावित थे। मुंशी प्रेमचंद की दो विवाह हुआ था। पहला विवाह जब वो 15 वर्ष की उम्र में हो गया था  असफल रहा। चुकी  विधवा विवाह के पक्षधर थे इसीलिए 1906 में अपना दूसरा विवाह बाल-विधवा शिवरानी देवी से किया। मुंशी जी शिवरानी देवी के तीन संताने हुई। श्रीपत राय और अमृत राय नाम से दो पुत्र और कमला देवी नाम की एक पुत्री हुई। मुंशी प्रेमचंद के पुत्र अमृत राय भी बहुत ही प्रसिद्ध साहित्यकार हुवे उन्होंने अपने पिता मुंशी प्रेमचंद को कलम का सिपाही कहा हैं।   

चुकी प्रेमचंद मूल रूप से उर्दू के लेखक थे जो बाद में हिंदी भाषा पर आए। प्रेमचंद की अधिकांश रचना मूलतः उर्दू भाषा में ही हैं जिसे बाद में हिंदी भाषा में तर्जुमा किया गया। मुंशी प्रेमचंद अपने अपनी दिनों में बहुत बीमार हो गए थे उनकी अंतिम रचना 'मंगलसूत्र' उनके मृत्यु की वजह से अधूरी रह गई जिसे बाद में उनके पुत्र अमृत राय ने पूरा किया।


मुंशी प्रेमचंद के साहित्यिक जीवन का प्रारंभ :

मैट्रिक की परीक्षा पास करने के साथ ही प्रेमचंद का साहित्यिक जीवन की शुरुआत हो गई थी लेकिन उनके द्वारा लिखित पहली हिंदी कहानी सरस्वती पत्रिका द्वारा अपने दिसम्बर के अंक में 'सौत' नाम से प्रकाशित किया। प्रेमचंद जी द्वारा लिखित अंतिम कहानी 'कफ़न' 1936 में प्रकाशित हो हुई थी। प्रेमचंद द्वारा लिखित 'पहली रचना' के अनुसार उनकी पहली रचना उनके मामा पर लिखा एक व्यंग था जो समय के साथ विलुप्त हो गया और अब अनुपलब्ध हैं।

उनकी पहली रचना उर्दू में थी और उनका पहला उर्दू उपन्यास का नाम 'असरारे मआबिद' था। वही प्रेमचंद जी के दूसरे उपन्यास का नाम 'हमखुर्मा और हंसवाब' था जिसका हिंदी तर्जुमा 'प्रेमा' नाम से 1907 में प्रकशित हुआ था।

इसके बाद 1908 में 'सोजे वतन' नाम से एक क्रांतिकारी तथा देशभक्ति की भावना से ओतप्रोत कहानी संग्रह प्रकाशित हुआ जिस वजह से मुंशी प्रेमचंद को कलेक्टर ने लाइन हाजिर किया तथा वार्निंग दिया की यदि दुबारा ऐसी रचना की तो कड़ी सजा दी जाएगी और जेल में डाल दिया जायेगा।

उसके बाद से मुंशी प्रेमचंद अपने मित्र की सलाह से अपना लेखन नाम धनपत राय को बदल कर प्रेमचंद के नाम से लिखने लगे।

प्रेमचंद के नाम से धनपत राय उर्फ़ मुंशी प्रेमचंद की पहली कहानी 'बड़े घर की बेटी' जमाना पत्रिका द्वारा अपने दिसम्बर के अंक में 1910 में प्रकाशित किया था। मुंशी प्रेमचंद द्वारा लिखित कई कहानियाँ उनके मरणोपरांत प्रकाशित हुई। उनके मरणोपरांत प्रकाशित होने वाला पहला कहानी संग्रह का नाम 'मानसरोर' था।


प्रेमचंद ने कुल 15 उपन्यास, 300 से अधिक कहानियाँ , 7 बाल कहानियाँ , 10 अनुवाद,  3 नाटक साथ ही हजारो पृष्ठ का लेख, सम्पादकीय आदि आदि।  प्रेमचंद ने अपनी सभी रचनाओ का रूप गुलामी की काल में ही की हैं।  गुलामी का काल होते हुवे भी इतनी विशाल सँख्या में रचनाएँ करना एक मील के पत्थर के सामान ही हैं।

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