Monday, November 11, 2019

Guru Nanak Dev Ji का रामलला दर्शन, प्रेरणादायी जीवन परिचय और उनसे जुड़ी चमत्कारी कहानियाँ।

Guru Nanak Dev Ji द्वारा सिख समुदाय की स्थापना की गई थी। सिख समुदाय या सिख धर्म, सनातन धर्म का एक अभिन्न अंग हैं। हिन्दू और सिख दोनों का मूल एक ही हैं। दोनों एक ही वटवृक्ष के दो टहनियाँ हैं। सिख समुदाय अपने गौरवशाली इतिहास अपने स्वाभिमान तथा मानव सेवा के लिए समस्त दुनिया में विख्यात हैं। सिख समुदाय का संस्कृति और संस्कार मानवता के प्रति प्रेम को बचाए रखने के लिए अत्यंत जरुरी हैं। सिख समुदाय पुरे विश्व में भूखो का पेट भरने वाला सबसे बड़ा समुदाय हैं। इस समुदाय द्वारा देश विदेश में हजारो जगह लंगर चला कर प्यासो का प्यास तथा भूखो के भूख को बिलकुल मुफ्त में तृप्त किया जाता हैं। सिख समुदाय के आस्था का केंद्र स्वर्ण मंदिर अमृतसर में प्रतिदिन लाखो लोगो को बिना मजहब, पंथ, जात देखे बिना सुबह शाम मुफ्त में भोजन कराया जाता हैं। आइये आज हम सिख समुदाय जैसे महान धर्मभक्त समुदाय के संस्थापक महात्मा guru nanak dev के जीवनी के बारे में विस्तार से चर्चा करते हैं।

हिन्दू परिवार में जन्म लेने वाले guru nanak dev ji के लिए मानव प्रेम और मानव सेवा ही जीवन का लक्ष्य था। धार्मिक कट्टरता के वातावरण में गुरुनानक देव ने लोगो को आपसी प्रेम और शांति का सन्देश देने के लिए एक सन्यासी की तरह अपने चार साथियों के साथ अपने घर को छोड़ दिया थे तथा भारत अफगानिस्तान अरब फारस आदि कई जगह यात्रा करके लोगो को प्रेम और शांति का पथ पढ़ाया।


birthday of guru nanak dev ji : जिवन परिचय 

guru nanak dev ji
guru nanak dev ji

guru nanak dev ji का जन्म गुलामी काल के सबसे बुरे समय में हुआ था। guru nanak dev ji का जन्म धर्म और देश के लिए घनघोर अँधेरे में प्रकाश समान था। guru nanak dev ji ने एक ऐसा समुदाय की शुरुआत जी जिसने आने वाले समय में भारत देश का भारतीय संस्कृति का स्वर्णिम इतिहास लिखा guru nanak dev जी ने अपने समुदाय द्वारा दिए गए बलिदान से वीरता को परिभाषित किया हैं। guru nanak dev जी के जन्मदिन को गुरुनानक जयंती के रूप में पुरे भारत साथ ही देश-विदेश में बड़े ही धूम-धाम से मनाया जाता हैं। 

guru nanak dev ji का जन्म 1469 में कार्तिक पूर्णिमा के दिन रावी नदी किनारे तलवड़ी नामक गाँव में एक खत्रिकुल में हुआ था। guru nanak dev ji का जन्मस्थान अब पकिस्तान के पंजाब प्रान्त में पड़ता हैं। तलवड़ी अब ननकाना साहेब के नाम से जाना जाता है जो लाहौर शहर से दक्षिण-पश्चिम दिशा में 30 मिल की दुरी पर स्थित हैं। कुछ इतिहासकारो का कहना हैं की guru nanak dev ji का जन्म 15 अप्रैल 1469 हैं लेकिन प्रचलित तिथि कार्तिक पूर्णिमा है जो दिवाली से 14 दिन बाद ओक्टुबर-नवंबर के महीने में आता हैं इस दिन को प्रकश उत्सव के रूप में भी बड़े हर्षोउल्लास के साथ मनाया जाता हैं।  

गुरुनानक देव जी का जन्म एक धनी था सम्पन्न परिवार में हुआ था। guru nanak dev ji के पिताजी का नाम मेहता कालू तथा माताजी का नाम तृप्ता देवी था। नानक देव जी के गांव तलवड़ी का नाम आगे चलकर guru nanak dev ji के नाम पर ननकाना साहेब पड़ गया। गुरुनानक देव जी की एक बहन थी जिनका नाम नानकी था। 

guru nanak dev ji बचपन से ही विलक्षण प्रतिभा के धनी थे। बचपन से ही सामान्य बालको की अपेक्षा guru nanak dev ji की बुद्धि बहुत ज्यादा प्रखर थी। बालक नानक की बुद्धि देखकर शिक्षक हैरान रह जाते थे थोड़े ही समय में नानक ने हिंदी, संस्कृत, फ़ारसी और तुर्की भाषा को सिख लिया।  बचपन से guru nanak dev ji की आसक्ति दुनियादारी में नहीं थी शिक्षा ग्रहण करते समय भगवान को प्राप्त करने के कई प्रश्न अपने शिक्षकों से पूछते रहते थे guru nanak dev ji के शिक्षक उनके विचित्र और रहस्य्मयी प्रश्नो से हार ही मान लेते थे और उन्हें ससम्मान घर पहुँचा दिया गया और guru nanak dev ji का 8 साल की उम्र में उनसे स्कूली पढाई भी छूट गई। 

नानक का मन पाठशाला में नहीं रमा पाठशाला छोड़कर वो गांव के निकट जंगलो में चला जाया करते थे नही तो साधु-संतो की संग रहते थे। guru nanak dev ji अपना समय आध्यात्मिक चिंतन और भगवत्प्राप्ति या परमसत्य को जानने के अभिक्रमो को करने लगे। guru nanak dev ji के साथ बचपन में ही कई ऐसी चमत्कारी घटनाएँ घटी जिससे गाँव के लोग भी आश्चर्यचकित रह गए और तब से गाँव और आसपास के लोग guru nanak dev ji को दिव्य बालक मानने लगे। 



"कहा किया है सच्चा सौदा, भूखों के खातिर अन्न ख़रीदा "

guru nanak dev ji के पिताजी ने नानक को कृषि, व्यापर आदि में लगाया लेकिन उनके सारे प्रयास निसफल हुवे। guru nanak dev ji प्रभु चिंतन में लगे रहते थे यह देख कर पिताजी कल्याण राय दुखी रहा करते थे वो चाहते थे की नानक कुछ काम करे और यही सोच कर एक बार उन्होंने नानक को 20 रूपया बाजार भेजा और कहा ऐसा सौदा खरीदना जिससे बेचने पर लाभ हो। guru nanak dev ji पैसा लेकर बाजार की ओर चल पड़े तभी रास्ते में उन्होंने भूखे साधु संतो को देखा उन्होंने उन पैसो से तुरंत बाजार से भोजन सामग्री लाकर उनको खिलाया और उनकी भूख शांत की उसके बाद नानक जी ख़ुशी ख़ुशी घर चले आये। घर आने पर पिताजी कल्याण राय ने पूछा की व्यापार में कितना मुनाफा कमाया तो इसके उत्तर में guru nanak dev ji ने कहा की मैंने उस धन से बाजार से भोजन खरीदकर भूखे लोगो को खिला दिया जो की घर त्याग कर सन्यासी बन गए थे वे कर्म-योगी बन कर अपने घर वापस गए हैं इससे खरा सौदा और क्या होगा ? मैंने तो सच्चा सौदा किया हैं। guru nanak dev ji कहते थे भूखो का पेट भरना ही जीवन का मुख्य उद्देश्य है और शायद यही शिक्षा का दें हैं की guru nanak dev ji के जन्म के 550 साल बाद भी सिख समुदाय पूरी ईमानदारी से निःस्वार्थ भाव से लोगो का पेट भरने का कार्य कर रहे हैं। 
  

guru nanak dev ji मोदीखाने में 

पिता मेहता कालू अपने पुत्र नानक को व्यापार आदि लगाना चाहते थे जिससे नानक एक होनहार कुशल व्यापारी बन सकें लेकिन guru nanak dev ji तो प्रभुचिंतन में लीन रहते थे। एक दिन क्रोधित होकर  पिता मेहता कालू  नानक को भैस चराने के लिए भेज दिया फिर वह ख़ुशी ख़ुशी भैस चराने लगे और प्रभु की वंदना करने लगे जीसवजह से उन्हें कई बार अपने पिता द्वारा ताड़ना का भी शिकार होना पड़ता था। नानक जी की बहन नानकी उनको बहुत प्रेम करती थी और फिर उनके बहन नानकी ने guru nanak dev ji को सुल्तानपुर लोधी रहने के लिए अपने पास लेकर आ गई । guru nanak dev ji के बहनोई  जयराम जी दौलत खाँ लोधी के दरबार में दीवान थे। अतः उन्होंने guru nanak dev ji को नवाब दौलत खाँ के मोदीखाने में मोदी के रूप में रखवा दिया। तथा गुरुनानक देव को समान बेचने का जिम्मेदारी मिला। 

guru nanak dev ji अपने कार्य में पूरी दया भावना और ईमानदारी से लग गए guru nanak dev ji जरूरतमंद लोगो को बिना मूल्य ही सामान दे दिया करते थे। एक दिन एक आदमी को आटा तौल कर दे रहे थे बारह तक गिनती तो ठीक थी लेकिन जैसे ही तेरह तेरह की गिनती से तौलने लगे तभी इसी शब्द से guru nanak dev ji को सत्य का साक्षात्कार हुआ और तेरह तेरह गिनते हुवे तेरा तेरा कहने लगे और सब तेरा हैं कहते हुवे खरीददार को दे दिए। guru nanak dev ji खुले हाथ से अन्न भंडार से अन्न सुपात्र को दान देने लगे। लोधी तक शिकायत पहुंची की नानक नवाब का खजान मुफ्त में लुटा रहा हैं फिर नवाब ने अन्न भण्डार का पाई पाई हिसाब जोड़ा तो उसे पाई पाई सही मिली guru nanak dev ji पर लगा आरोप झूठा साबित हो गया और नवाब भी guru nanak dev ji के कार्यप्रणाली और ईमानदारी को देख कर बहुत प्रभावित हुआ। 

                            "तेरा तेरा बोलते करते करते तोल 
                    तेरा सर्व करतार जी फिर किसका क्या मोल ?"

guru nanak dev ji का विवाह 

guru nanak dev ji का विवाह मोदीखाने से वापस आने पर पूर्ण युवावस्था में उनके पैतृक गांव रायभोय  तलवड़ी में नगर बाटला जिला गुरदासपुर के लाखौकी नामक स्थान निवासी चोणे गोत्र के क्षत्रिये मूलचंद्र और माता चांदोरानी की सुपुत्री सुलक्खनी  हुआ था।  guru nanak dev ji और सुलक्खनी से दो पुत्र हुवे जिसमे बड़े पुत्र का नाम श्रीचंद तथा छोटे पुत्र का नाम लक्ष्मीदास था। 


दोनो पुत्रो के जन्म के बाद अपने पत्नी और बच्चो को अपने श्वसुर मुला के संरक्षण में रख कर guru nanak dev ji घर को छोड़ कर अपने चार साथियो के साथ तीर्थ यात्रा पर निकल गए। guru nanak dev ji के चार साथियों का नाम मरदाना, लहना, बाला और रामदास था। 1521 तक उन्होंने लगभग तीन यत्राचक्र को पूरा किया जिनमे भारत, अफगानिस्तान, अरब तथा फारस के विभिन्न स्थान सम्मिलित हैं। 


guru nanak dev ji सतनाम  उपदेश करने के लिए देश-विदेश भ्रमण किए। दक्षिण में सेतुबंध, रामेश्वरम तथा सिंह द्वीप आदि स्थानों पर जाकर अपना उपदेश दिया। वहा से लौटकर गढ़वाल, हेमकुंड, टिहरी, दिल्ली, अयोध्या,सिरमौर, गोरखपुर, सिक्किम, भूटान और तिब्बत आदि  यात्रा की। उसके बाद बलूचिस्तान होते हुवे मक्का मदीना भी गए इस यात्रा के मध्य guru nanak dev ji ने ईरान, कंधार, काबुल तथा बगदाद आदि में भी सतनाम का उपदेश दिया था।

इस यात्रा के दौरान Guru Nanak Dev Ji कुष्ठ रोगी यहाँ भी रुके तथा अपनी चमत्कारी  रोग को भी ठीक कर देते थे मक्का मदीना के यात्रा के दौरान जब  बेफिक्र होकर लेटे थे तो उनका पैर काबा की तरफ था तो एक व्यक्ति ने Guru Nanak Dev Ji को टोकते हुवे बोला की तुम अपना पैर पवित्र काबा की तरफ करके क्यों लेटे हो उत्तर देते हुवे Guru Nanak Dev Ji ने कहा की तुम मेरा पैर उस दिशा में कर दो जिस दिशा में काबा नहीं हैं। वह व्यक्ति जिधर पैर घुमाता उधर ही उसे काबा नजर आता वह समझ गया की Guru Nanak Dev Ji साधारण मनुष्य नहीं हैं और फिर गुरुनानक देव से माफ़ी माँग कर वहा से चला गया। 



guru nanak dev ji द्वारा रामलला का दर्शन और अयोध्या यात्रा  

अयोध्या में राम जन्म भूमि सुनवाई में गुरुनानक देव जी का भी जिक्र हैं। अदालत के 1045 पन्नो के आदेश में एक गवाह के हवाले से कहा गया हैं की सीखो के प्रथम गुरु नानक देव अयोध्या आये थे और उन्होंने भगवान राम के दर्शन भी किए थे। अदालत में दर्ज कई याचिकर्ताओं में से एक मामले में गवाह के तौर पर पेश हुवे राजेंद्र कुमार ने यह दवा किया हैं। फैसले में वर्णित हैं की राजेंद्र सिंह की सिख धर्म के साहित्य और संस्कृत में रूचि थी। गवाही के दौरान उन्होंने सिखधर्म के किताबो का उल्लेख किया साथ ही यह दावा किया की guru nanak dev ji राम जन्मभूमि के दर्शन के लिए 1510 और 1511 के बिच अयोध्या आए थे। जिस समय गुरुनानक देव अयोध्या में थे उस समय तक कोई बाबरी मस्जिद नहीं बनी थी बाबरी मस्जिद का निर्माण 1528 से 1530 के बिच हुआ था। 

राजेंद्र सिंह ने साक्ष्य के तौर पर कई जन्मसखी (गुरुनानक देव की जीवनी ) पेश की जिसमे guru nanak dev ji के अयोध्या आने का और भगवान श्री राम जन्मभूमि दर्शन करने का विस्तार से उल्लेख मिलता हैं। गवाहों ने जन्मसखि को एफिडेविट के तौर पर कोर्ट में पेश किया। इसके अलावा सिख धर्म के कई गुरु जैसे गुरु तेग बहादुर गुरु गोविन्द सिंह ने न सिर्फ अयोध्या की यात्रा और रमजन्मभूमि के दर्शन किये बल्कि मुग़ल सेना से युद्ध कर राम जन्मभूमि की रक्षा के लिए बलिदान भी दिए हैं।  


guru nanak dev ji  के उपदेश 

guru nanak dev ji के उपदेशो में ऐसा चमत्कार था की सभी वर्गो के लोग बड़े आसानी से उनके शिष्य बन जाते थे। नानक देव के शिष्यों की उनपर बहुत ही श्रद्धा थी। गुरुनानक देव के उपदेशों की भाषा सीधी सादी और शैली सरल होती थी जिसके अर्थो को आम जान भी बहुत आसानी से समझ जाते थे और सत्य का ज्ञान भी हो जाता था। guru nanak dev ji के उपदेशो को लोग सर झुकाकर स्वीकार करते हैं। गुरुनानक देव हिन्दू मुस्लिम बौद्ध जैन सभी के तीर्थो की यात्रा और दर्शन किए।  

गुरुनानक देव द्वारा लिखित वाणी श्री गुरुग्रंथ साहिब में निहित हैं। Guru Nanak Dev Ji के महान दार्शनिक ज्ञान, सूझ-बुझ और प्रभावशाली काव्य के सामने बड़े बड़े विद्वानों का ज्ञान कम पड़ जाता हैं। गुरुनानक देव को एक युगप्रवर्तक कहना कही से भी अतिश्योक्ति नहीं कहलाएगी। 

guru nanak dev ji ने रूढ़िवादी विचारधारा और कुसंस्कारो का विरोध किया। गुरुनानक देव कहते थे ईश्वर सातवे आसमान पर नहीं प्रत्येक जिव में वास करता हैं ईश्वर कही बहार नहीं आपके भीतर हैं।  इन्ही विचारधारा की वजह से इब्राहिम लोदी नामक क्रूर शासक द्वारा नानक देव जी को कैद में डाल दिया गया। नानक देव के कैद में रहते ही प्रसिद्द पानीपत का युद्ध प्रारम्भ हो गया और इब्राहिम लोदी की हार हुई और दूसरे क्रूर शासक बाबर के हाथ में सत्ता आ गई। उसके बाद guru nanak dev ji को कैद से छोड़ दिया गया। 


मक्का मदीना से वापस आने के दौरान बाबर की सेना ने Guru Nanak Dev Ji को कैदी बना लिया लेकिन बाबर को जब उनके प्रसिद्धि के बारे में पता चला तो उसने  गुरुनानक देव को छोड़ना चाहा लेकिन गुरुनानक देव ने अपने सारे कैदियों को भी छुड़ाने शर्त रखी और सबको बाबर की कैद से मुक्त भी कराया। 

Guru Nanak Dev Ji के अंतिम दिन 

जीवन अंतिम दिनों में Guru Nanak Dev Ji की ख्याति बहुत बढ़ गई थी। अपनी 25 साल के लम्बे यात्रा के बाद उन्होंने करतारपुर में अपना आश्रम बनाया तथा परिवार सगे सम्बन्धियों के साथ वही रहने लगे। इसी करतारपुर नामक स्थान जो अब पकिस्तान  गुरुनानक देव ने आश्विन कृष्ण दशमी के दिन 1539  समाधी ले ली। समाधी  पूर्व  लहिना नामक शिष्य भाई को कड़ी परीक्षा के बाद नानक देव लहिना को अपना उत्तराधिकारी घोषित करते हुवे उसका नाम गुरु अंगद रख दिया  

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 9 नवम्बर 2019 ,550 वे प्रकाश उत्सव के उपलक्ष्य पर पकिस्तान के करतारपुर साहेब स्थित गुरुद्वारा सिख समुदाय के दर्शन के लिए करतारपुर कॉरिडोर का उद्घाटन किया हैं जिससे कि सिख भाई अपने तीर्थ स्थलों पर आसानी से घूम सके अपने आराध्य का दर्शन कर सके। 

indian army join करने में सिख सबसे आगे रहते हैं 

भारत की जनसँख्या के हिसाब से सिख समुदाय की जनसँख्या नगण्य हैं फिर भी indian army  में सबसे ज्यादा यदि किसी समुदाय के सैनिको की संख्या हैं तो वह सिख समुदाय हैं। सिख समुदय के युवा indian army join करने के मामले में या अपने देश और संस्कृति की रक्षा करने के मामले में पहले पायदान पर खड़े रहते हैं। यह सब guru nanak dev ji जैसे महान ऋषि के शिक्षा से ही संभव हो सकता हैं। कई लोगो का मानना हैं की विदेशी आक्रमणकारियों से देश और धर्म की रक्षा के लिए guru nanak dev ji ने एक समूह को रक्षा के सभी नियमो में शिक्षित किया सीखा  दिया अतः जिन्होंने अपने देश और संस्कृति की रक्षा के लिए guru nanak dev ji से शिक्षा प्राप्त कर शिक्षित हुवे उनको सिख कहा गया।

इसी सिख समुदाय के गुरुओ और सिख समुदाय के युवाओ के बलिदान का परिणाम हैं की आप यह आर्टिकल हिंदी में पढ़ रहे हैं और मैं हिंदी में लिखने के लिए स्वतंत्र हूँ नहीं तो मै और आप मुस्लिम होते और उर्दू पढ़ रहे होते। जिस देश में सिख जैसा समुदाय नहीं था, वह देश अपनी संस्कृति, अपनी भाषा, अपना इतिहास भूल के आज के समय में हल्ला हुँआ अकबर कर रहे हैं उस देश का इस्लामीकरण हो चूका हैं लेकिन इस्लामी आतंकवादिओं का भारत पर कई बार आक्रमण हुआ हजारो सालो तक सनातन धर्म गुलाम रहा फिर भी भारत का इस्लामीकरण नहीं हो पाया क्यों क्युकी यहाँ  सिख मराठा क्षत्रिए ब्राह्मण वैश्य शूद्र जैसे अनेक शूरवीर योद्धाओ ने भारत और धर्म की रक्षा में बेझिझक प्राण लुटाए और दुश्मनो के गर्दन तलवारो से उड़ाए अच्छा हुआ मुग़लकाल में गाँधी नहीं था नहीं तो कसम से अभीतक गजवा हिन्द हो चूका रहता।

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