क्या आप जानते है पितृ पूजा के पीछे क्या विज्ञान हैं ? क्यों किया जाता हैं यह पूजा ?

आखिर पितृ पूजा के पीछे क्या रहस्य हैं ? हिन्दू लोग सनातन काल से क्यों पितृ लोगो की पूजा करते रहे हैं ?

भारत के लोग पुरे विश्व में पूजा करने के लिए जाने जाते हैं। पूजा के अनेक प्रकार हैं अनेक अर्थ हैं लेकिन सबका उद्देश्य एक ही हैं और वह उद्देश्य यह हैं की उस सर्वशक्तिशाली का साक्षात्कार करना, उस परम सत्य को जानना। भारतीय इतिहास में कई ऐसे लोग हुवे जिन्होंने उस परम सत्य का साक्षात्कार किया हैं तथा उस सत्य को विभिन्न प्रकार के रूप में व्यक्त किया हैं। विविधता में एकता ही भारत की संस्कृति हैं।  33 कोटि(प्रकार) देवी देवता, कई कोटि उपासना विधि, कई भाषाएँ, हजारो बोलिया, खान-पान, रहन-सहन सब चीज अलग अलग हैं फिर भी सबका उद्देश्य एक हैं उस सर्वशक्तिशाली तक पहुंचना उसको प्राप्त करना आत्मसात करना। जैसे समुद्र का जल और लोटे का जल वस्तुतः एक ही हैं बस पात्र का ही भेद हैं। 

A hindu performing pitra puja
A hindu performing pitra puja 


परम सत्य का साक्षात्कार करने वाले हमारे ऋषि मुनियो के बनाए गए परम्परा द्वारा, हमारे पूर्वजो द्वारा हमें यह ज्ञान हुआ की मृत्यु अंत नहीं, मृत्यु मुक्ति हैं। परिवार या कोई नजदीकी की मृत्यु हो जाती हैं तो मोह प्रेम के कारण हमें दुःख होता हैं हम विलाप करते हैं लेकिन यदि ज्ञान रूप से देखा जाए तो यही एक सत्य हैं जो अपरिवर्तनीय हैं "जो आया हैं उसको जाना ही हैं " लेकिन जो आया हैं वो कहा से आया है और कहा जाएगा इस बात को जानने की जिज्ञासा हमेशा से मनुष्यों को रही हैं। इस जिज्ञासा को हमारे ऋषि मुनियों ने बड़े ही गूढ़ रूप से अपने ग्रंथो में बताया हैं।  

जरुरी नहीं की जो हम देख रहे हैं, जो हम सुन रहे हैं,जो हम अनुभव कर रहे हैं, वही दुनिया हैं वही अंतिम सत्य हैं। परमाणु को हम नहीं देख सकते लेकिन वो हैं हम वही देख सकते हैं जितनी हमारी आँखों को देखने की क्षमता हैं ज्यादा क्षमता की आँखों से यही दुनिया बिलकुल उलट दिखेगी जैसे माइक्रोस्कोप दूरबीन। भौतिक ही अंतिम सत्य नहीं हैं इस बात को मॉडर्न वैज्ञानिक भी सिद्ध कर चुके हैं ड्यूल नेचर ऑफ़ पार्टिकल। यह शरीर अंतिम सत्य नहीं हैं हम सोचते हैं की यह फिजिकल बॉडी ही मैं हूँ पाश्चात्य सोच यही हैं जन्म होते ही मैं मेरा अस्तित्व बना मृत्यु होते ही सबकुछ मेरा अस्तित्व भी ख़त्म।

A hindu performing pitra puja
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परन्तु सनातन लोग ऐसा नहीं सोचते या ऐसा उनके पूर्वजो ने नहीं बताया हैं। सनातन हिन्दू लोगो का विचार हैं की इस फिजिकल बॉडी के अलावा भी एक एनर्जी हैं जो इस फिजिकल बॉडी के अंगो को चला रही हैं इस एनर्जी से ही दिमाग और धड़कन को शक्ति मिलती हैं लेकिन यह एनर्जी कभी मरती नहीं हैं फिजिकल बॉडी मरती हैं। "मै नहीं मरा मेरा शरीर मरा।"


ऊर्जा का कभी अंत नहीं होता मनुष्य अपने विवेक से इस एनर्जी को बस ट्रांसफॉर्म कर पाता हैं। हमारे कई ग्रंथो में कितनी ऐसी कहानियाँ हैं की हमारे ऋषि मुनि इस एनर्जी को भली प्रकार जान चुके थे उन लोगो ने इस एनर्जी का सम्पूर्ण कण्ट्रोल सिद्ध कर लिया था। मॉडर्न विज्ञान ने कहा हैं एनर्जी को ना ही बनाया जा सकता हैं और ना ही इसको नष्ट किया जा सकता हैं इसके बस एक रूप से दूसरे रूप में ट्रांसफर किया जा सकता हैं। मॉडर्न विज्ञान में इसको "ऊर्जा संरक्षण का नियम" कहते हैं। इस ऊर्जा या एनर्जी को हमारे ऋषि मुनि ने आत्मा कहा हैं।  आत्मा या सूक्ष्म शरीर भी कहा गया हैं। फिजिकल बॉडी मतलब भौतिक शरीर सिर्फ मनुष्य का ही नहीं सभी जिव, पेड़-पौधे, जानवर, मछली इन सब शरीर में वह एनर्जी रहती हैं तभी यह शरीर शिव हैं बिना एनर्जी, शक्ति या आत्मा के शरीर शव हैं।

A hindu performing pitra puja
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आत्मा कर्मो के फल के बंधन से बंधी हैं आत्मा शरीर द्वारा जिन कर्मो में संलिप्त रहता हैं उसी अनुसार फल रूपी शरीर मिलता है या पुण्य कर्म की अधिकता पर मोक्ष या शरीर बंधन या जन्म-मृत्यु बंधन से मुक्ति मिलती हैं। नाली के कीड़ो वाला कर्म नाली के कीड़े की योनि दिलाता हैं साधू वाला कर्म फल बंधन से मुक्ति या मोक्ष दिलाता हैं।

सब कर्म के फल पर निर्भर हैं यह एनर्जी, शक्ति या आत्मा कभी मरती नहीं बस कर्म के फलो अनुसार शरीर बदलती रहती हैं जैसे हम कपडे बदलते हैं वैसे ही आत्मा शरीर बदलती हैं। जब आत्मा मरती ही नहीं और जीवन भौतिक शरीर का और आत्मा का योग हैं तो वास्तव में कोई कभी मरता कहा हैं ? वह तो उसका शरीर काम लायक नहीं रहता, एक्सपायर हो जाता हैं। वह तो हैं बस उसका भौतिक शरीर ना रहा।

A hindu performing pitra puja
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अब कर्म फल के अनुसार मुक्ति पायेगा या फिर किसी योनि में भौतिक शरीर धारण करेगा। इसी सत्य को ऋषि मुनियों ने पुनर्जन्म कहा आत्मा के द्वारा शरीर बदलना ही पुनर्जन्म कहलाता हैं। ठीक इसी अवधारणा के तहत सनातन हिन्दू अपने पितृ लोगो के आत्मा की मुक्ति के लिए पूजा करते हैं। आत्मा द्वारा मुक्ति मिलने में या दूसरा शरीर मिलने में कर्म के फल के अनुसार कुछ समय लग भी सकता हैं अपने कर्मो के अनुसार आत्मा कुछ समय के लिए स्वर्ग तो कुछ समय के लिए नर्क में रहती हैं कभी कभी कर्मानुसार आत्मा प्रेत योनि में भी प्यासा तड़पती रहती हैं।

यह एनर्जी, शक्ति या आत्मा, शरीर द्वारा जैसा कर्म करती हैं वैसा ही गति को प्राप्त होती हैं। विज्ञान में भी न्यूटन ने एक सिद्धांत दिया जिसका नाम हैं 'गति का नियम' जिसका तीसरा और आखिरी नियम भी यही कहता हैं "Every action has a equal reaction." हम भारतीय इस नियम को बहुत ही सरल रूप में जानते हैं "जैसी करनी वैसी भरनी " .

कर्म का फल तो मिलता ही हैं लेकिन पुण्य कर्म करके, पूजा करके, भक्ति करके, अच्छे फल सुनिश्चित किया जा सकता हैं इसलिए हर एक पुत्र का कर्तव्य हैं की वो अपने पिता के भौतिक शरीर के मृत्यु के बाद भी उनके आत्मा के उच्च गति के लिए मुक्ति के लिए वह पुत्र अपने पितरो की पूजा करे। जिससे की उनके आत्मा को शांति मिले यदि वह प्रेत योनि में हो तो तर्पण द्वारा उनकी प्यास बुझाया जा सके।

A hindu performing pitra puja
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पुत्र ही क्यों ? क्युकी पिता के गुण ही पुत्र में आते हैं पिता के आत्मा के कुछ अंश पुत्र में ही होते हैं। पुत्र के हाथो की गई पूजा, पुत्र के हाथो श्रद्धा पूर्वक अर्पित किया गया जल पितृ को प्राप्त होता हैं यह बहुत ही सूक्ष्म विज्ञान हैं बहुत ही गूढ़ हैं। भौतिकता के पैमाने पर इस विज्ञान को डिटेक्ट नहीं किया जा सकता।

इसीलिए हमें अपने पितरो की पूजा करनी चाहिए खास कर पितृ पक्ष के समय क्युकी इस समय पितृ एनर्जी का लेवल अलग होता हैं। पितृ पक्ष में किया गया विधि पूर्वक पूजा शुभ फलो को प्रदान करने वाला होता हैं। यदि पितृ खुश तो आपका जीवन भी खुश आपके बच्चे भी खुश।


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