भारत आज़ाद हैं, यह सबसे बड़ा मजाक हैं।

लाखो बलिदानी की कहानी गुम क्यों हैं ? 

लगभग 72 सालो से हम भारतीय हर साल स्वतंत्रता दिवस मानते चले आ रहे है स्वंत्रता दिवस के बारे में हमें जो भी जानकारी मिली वह हमारे विद्यालय के पाठ्यपुस्तकों से मिली। जिसमे गिने चुने क्रन्तिकारी तथा विशेष समूह के लोग का ही महिमा मंडन किया गया हैं। हमें बताया गया "बिना खड़ग बिना ढाल साबरमती के संत (मोहनदास करमचंद गाँधी ) तूने कर दिया कमाल।" लेकिन जब हम पाठपुस्तक से अलग के किताबो जिनको सत्य जानने के लिए इग्नोर नहीं किया जा सकता उनसे पता चलता हैं की लाखो भारतियों ने अपने प्राण स्वतंत्रता के लिए, राष्ट्र के लिए अर्पित कर दिया था, हजारो क्रांतिकारी वन्दे मातरम का उद्घोष करते हुवे फाँसी के फंदे को अपने गले लगा लिया था, कितनो ने अंग्रेजी की गोलियाँ हँसते हँसते अपने छाती पर खाई, क्या इतने बलिदान को भुला कर आप एक व्यक्ति को भारत के आज़ादी का सारा श्रेय कैसे दे सकते हैं? शिक्षा तंत्र, न्याय तंत्र, सविधान,आरक्षण, चिकित्सा तंत्र,  शिक्षण संस्थानों के कार्य प्रणाली और परिणामो को देखकर कई प्रश्न उठता हैं क्या सही में हम आजाद हैं 15 अगस्त 1947 को क्या हुआ था ?

यदि अंग्रेजो ने सिर्फ चुनाव की व्यवस्था कर दी होती तो भारत के आज का लोकतंत्र और अंग्रेजो के गुलामी तंत्र में रत्ती भर भी अंतर नहीं होता और तब हमको पता चलता की हम आज़ाद कहा हैं। बस 1947 के बाद चुनाव करने का अधिकार मिला बाकी सब अंग्रेजो द्वारा पहले ही सेट किया जा चूका था चाहे वो न्याय तंत्र हो, शिक्षा तंत्र हो, आखिर किस प्रकार की आज़ादी हमें मिली हैं जहाँ पहले गाँव का आम किसान, हजाम, बुनकर, सोनार, बनिया, वेद उपनिषद का प्रमाण दे कर अपनी बात रखता हो, जहाँ गाँव-गाँव गुरुकुलों में वैज्ञानिक, सर्जन, कलाकार, दार्शनिक जनहित में फ्री में बैठा हो, वहाँ स्वतंत्रता के 72 सालो बाद आज भी कई गावो में एक अदद विद्यालय और एक बढ़िया हॉस्पिटल नहीं बन पाया साथ ही अशिक्षित नेरोजगार बीमार लोग तड़प तड़प मर रहे हैं बेरोजगारों और सनातन व्यवसाय को ख़त्म होता देख प्रश्न उठा हैं क्या हम आज़ाद हैं ?

Bhagwa Dhwaj 

क्या भारत आज़ाद हैं ?

  1. श्री राम के देश में अपने मंदिर के लिए न्याय तंत्र पर निर्भर रहना प्रश्न करने पर मजबूर करता हैं की क्या हम आज़ाद हैं? 
  2. हर दिन हो रहे हिन्दू नेताओ के हत्याओं को देख कर प्रश्न उठता हैं की क्या हम आज़ाद हैं ? 
  3. आतंकवादियों को बचाने के लिए रात बारह बजे सुप्रीम कोर्ट खुल जाता है तो प्रश्न उठता है की क्या हम आजाद हैं ? 
  4. कश्मीर में दिनदहाड़े कत्लेआम करके लाखो कश्मीरी पंडितो को मार के उनको उनके घर से भगा दिया जाता हैं तो प्रश्न उठता हैं की क्या हम सही में आज़ाद हैं ? 
  5. राम जन्मभूमि, कृष्ण जन्मभूमि, विश्वनाथ मंदिर जैसे सैकड़ो पवित्र मंदिरो पर खड़े मस्जिदों को देख कर प्रश्न उठता हैं की क्या भारतीय संस्कृति आज़ाद हैं ? 
  6. खँडहर हो रहे संस्कृत विद्यालयों को देख कर प्रश्न उठता हैं की क्या हम आज़ाद हैं ? 
  7. कोई भी गैर मजहबी मक्का मदीना में पैर तक नहीं रख सकता, वैटिकन सिटी में भी गैर ईसाई प्रवेश नहीं कर सकते लेकिन भारत के सांस्कृतिक राजधानी बनारस में मस्जिदों के बड़े बड़े मीनार पर खड़े होकर चिल्लाते मुल्ले मौलवियों और ईसाइयों को देख कर प्रश्न उठता हैं की क्या हम आज़ाद हैं ? 
  8. चमार शब्द कहने पर जात के नाम पर बिना जाँच जेल में ठुसे गए लोगो को देखकर प्रश्न उठता हैं की क्या हम आज़ाद हैं ?
  9.  आरक्षण की वजह से जब गदहे घोड़ों को पछाड़ देते है तो प्रश्न उठता है की क्या हम आज़ाद हैं?
  10.  मरते किसानो को देख कर प्रश्न उठता हैं की क्या हम आज़ाद हैं ? 
  11. प्रकृति के संसाधनों का युद्ध स्तर पर दोहन देखकर यह प्रश्न उठता हैं क्या हम आज़ाद हैं ?
  12. कटती गाय देख कर लगता हैं क्या हम आज़ाद हैं ?
  13. जिस तंत्र ने हमें सोने की चिड़िया बनाया जिस गुरुकुल शिक्षण पद्धति ने हमें विश्व गुरु बनाया उस तंत्र को मृत्यु शैय्या पर देख कर प्रश्न उठता हैं की क्या हम आज़ाद हैं ? 
  14. आज़ादी के बाद भी वीर सावरकर और सुभास बाबू जैसे भारत को आज़ाद करने वाले महान क्रांतिकारियों के साथ हुवे दुर्व्यवहार देख कर उनको आज़ादी के बाद भी देश निकाला या वीर सावरकर को नेहरू द्वारा लाल किला में कैद रखने के कानून को देखकर यह प्रश्न उठता हैं की क्या हम आज़ाद हैं ?  
  15. नीरा आर्या जैसे साहसी क्रन्तिकारी का पहले स्तन काटा गया फिर आज़ादी के बाद फूल बेचकर उन्होंने अपना जीवन गुजरा किया 1998 तक वो लावारिस बीमार वृद्धा का जीवन जी रही थी उनकी झोपडी को भी नेहरू सरकार द्वारा तोड़ दिया गया। नीरा आर्या की कहानी सुनकर मन में प्रश्न उठता हैं क्या हम सचमुच आज़ाद हैं। 


न्याय तंत्र, शिक्षा तंत्र को तथा इनके परिणामो को करीब से देखने पर मन में प्रश्न उठना लाजमी हैं आखिर जिसने हमें गुलाम बनाया हमारे संस्कृति को धरातल में पहुँचा दिया जिसने भारतीयों का नरसंहार किया, हजारो हिन्दू माँ-बहनो को अपने हरम में रखा उनका बलात हर लिया आखिर वो औरंगजेब, शाहजहाँ, अकबर हमारे पाठ्यपुस्तक में प्रेम के निशानी या महान कैसे हैं? भारतीय शिक्षा तंत्र को देख कर ऐसा लगता हैं जैसे हमसे कुछ छुपाने की कोशिश की जा रही हैं पहला शिक्षा मंत्री कट्टर मौलवी था अब आप सोच सकते हैं हम या हमारी आने वाली पीढ़ी किस विचारधारा से प्रेरित पाठ्यपुस्तक पढ़ रही हैं। फिर हमारी मानसिकता उसी विचारधारा जैसी ही होंगी और हो भी गई है नहीं तो भारत माता की जो जय न बोले गाय जिसकी माता ना हो वो हमारे भाई कैसे फिर भी हम हिन्दू मुस्लिम भाई भाई चिल्लाते रहते हैं। क्या स्वतंत्र भारत की शिक्षा निति, जिसने भारत को कभी विश्वगुरु बनाया वैसा होना चाहिए या मुल्लो-मौलवियों, वामपंथियों, अंग्रेजो का गुणगान करने वाली होनी चाहिए ?


आज़ादी या सत्ता का हस्तरान्तरण:

सर्वविदित हैं की ब्रिटिश राज में सूरज कभी अस्त नहीं होता था। एक समय था की अमेरिका भी भारत की तरह अंग्रेजो का गुलाम था लेकिन उन्होंने भारत से पहले ही हिंसा के दम पर लड़ कर, मारकर मरकर उन्होंने अंग्रेजो को अपने देश से भगा दिया। फिर आज़ादी बाद अपनी जरुरत अनुसार अपने नियम बनाये, अपना सविधान बनाया।अमेरिकन ने अपने देश में वह सब नियम कानून बंद कर दिए जो कि अंग्रेजो के द्वारा बनाया था। अंग्रेजी भाषा भी अमेरिकन ने अलग बना लिया सड़क परिवहन यहाँ तक की इलेक्ट्रिक बोर्ड का स्विच बटन भी अपने अनुसार किया।  स्वतंत्रता का अर्थ ही होता हैं की हम अपने तरीके से अपने घर को सजायेंगे जिधर जरुरत होगा उधर उस हिसाब से नियम कानून बनाएंगे जैसी सिमा बनानी होगी हम अपने सहूलियत अनुसार अपनी सिमा का निर्धारण खुद करेंगे। 

आज़ाद हुवे पंछी को कोई नहीं बताता की उसको किस दिशा में उड़ना चाहिए, कहा जाना चाहिए? किस वृक्ष पर बैठना चाहिए किस पर नहीं। वह पक्षी आज़ाद हुआ हैं तो वह अपने मन से जिधर चाहेगा उधर उड़ेगा यह उसकी इक्षा हैं की वह किस वृक्ष की डाली पर बैठे यही तो उसकी  स्वतंत्रता हैं। या उसके पैर में लम्बी रस्सी बांध पिजड़े का दरवाजा खोल दिया जाये की जैसे ही वह पक्षी पिजड़े का दरवाजा खुला देख अपने आप को स्वतंत्र सोच कर उन्मुक्त गगन में उड़ान भरे कुछ दूर उड़ते ही धड़ाम से गिर जाए इसको आज़ादी नहीं लॉलीपाप कहते हैं जो की अंग्रेजो ने 15 अगस्त 1947 को हमें दिया  

भारत को आज़ाद करने से पहले से ही अंग्रेजो द्वारा बनाये गए नियमो-कानून में थोड़ा बहुत अदल-बदल के कथित नया दिखावे का सविधान निर्माण किया गया हैं सविधान निर्माण या गणतंत्र दिवस यह सब ढोंग हैं। आज भी सुप्रीम कोर्ट में भी बहुत ऐसे कानून हैं जो की अंग्रेजो के बनाये हैं। उन कानूनों के अनुसार ही  सुनवाई और सजा आज भी होती हैं जैसे IPC (इंडियन पैनल कोड)  अंग्रेजो ने जो भी कानून भारत को लूटने के लिए गुलाम बनाने के लिए बनाये थे वह सभी कानून या तंत्र हूबहू अंग्रेजो ने अपने नजदीकी सहयोगियों को दे कर यानी की सत्ता का हस्तारान्तरण नेहरू और गाँधी के हाथ में करके चले गए। भारत में सत्ता चलाने के सारे नियम कानून वही अंग्रेजो वाले हैं जो आजतक अभी भी चल रहा हैं।  15 अगस्त 1947 को सत्ता का हस्तारान्तरण हुआ न की हमने अंग्रेजो को हरा कर उनको यहाँ से भगा कर आज़ादी पाई और हमने उनको अपना गुरु मान उनके ही सविधान को ढ़ोना शुरू कर दिया। पंडित छोड़ काले अंग्रेज बन गए। 
भारत आज़ाद हैं, यह सबसे बड़ा मजाक हैं।  भारत आज़ाद हैं, यह सबसे बड़ा मजाक हैं। Reviewed by गुरूजी इन हिंदी on October 22, 2019 Rating: 5

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